Wednesday, March 28, 2007

प्रस्तावना....

जब मैने अपने मित्र अभिषेक ओझा के कुछ लेख पढ़े मुझे भी लगा जीवन की इस आपाधापी मे कुछ क्षण मुझे भी निकालने चाहिये अपने विचारों को व्यक्त करने के लिये। मेरे अंदर का लेखक जो कि शायद कहीं खो गया था या फिर चेतना शून्य हो चुका था वापस से अंगड़ाइयां लेने लगा। मुझे लगा क्यों न अपने अंदर के इस लेखक मे नये प्राण फूँके जायें। पुनः अपने विचारों को मुखरित किया जाय। मेरे मन के स्वछन्द विचार जो इस जीवन शैली मे निस्तेज होते जा रहे थे उन्हें फिर से स्वतंत्र किया जाय।
कारण जो भी हो मैं अब पुनः लिखूँगा.........