Tuesday, July 17, 2007

धर्म

बहुत दिनों से एक अच्छी फिल्म देखने की इच्छा मन मे थी। कल एक फिल्म देखी "धर्म"। मन को छू गयी। कहानी अपने मुख्य कलाकार पण्डित चतुर्वेदी के इर्द गिर्द घूमती है जिसको पंकज कपूर ने अभिनित किया है। पण्डित चतुर्वेदी एक कट्टर ब्राहमण हैं जो कि किसी शूद्र की छाया पड़ने तक से अपवित्र हो जाते हैं। पूरे वाराणसी मे पण्डित जी अत्यंत सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एक ठाकुर साहब के मंदिर के मुख्य पुरोहित हैं और ठाकुर साहब अपने अनेक कार्यों मे पण्डित जी से परामर्श लेते हैँ।
पण्डित जी की एक पुत्री है जिसे किसी दिन एक स्त्री अपना पुत्र थमा कर चली जाती है। काफी देर बाद भी जब वह स्त्री अपना बच्चा लेने नहीं आती है तो पण्डित जी की पुत्री उस बच्चे को अपने घर ले आती हे। बच्चे की जाति पूछने पर पण्डित जी की स्त्री और पुत्री झूठ बोल देते हैं कि बच्चा ब्राहमण कुल का है।
समय व्यतीत होता है और पण्डित जी का लगाव बच्चे से बढ़ता जाता है। पण्डित जी उस बच्चे का नाम कार्तिकेय रखते हैं।
कुछ वर्ष उपरांत लड़के की माता उसे लेने पण्डित जी के घर आ जाती है जिसे देखकर पण्डित जी को गहरा झटका लगता है। इसलिये नहीं कि लड़के से उन्हे अबतक गहरा लगाव हो चुका है बल्कि इस लिये कि वो लड़का एक ब्राहमण न होकर एक मुसलमान है। पण्डित जी उस लड़के की हर वस्तु को अपने घर से निकाल देते हैं पर लड़के की स्मृतियों को अपने मन से नहीं निकाल पाते हैं। पण्डित जी अपने घर की शुद्धि करते है और अपनी शुद्धि के लिये चंद्रायण व्रत तक रखते हैं।
समय व्यतीत होता है और वाराणसी मे हिन्दू मुसलिम दंगे हो जाते हैं जिनका प्रणेता ठाकुर साहब का पुत्र ही होता है। दंगों से अपने पुत्र को बचाने के लिये वही मुसलमान स्त्री एक बार फिर से अपने पुत्र को पण्डित जी के घर देने आती है जिसे पण्डित जी की स्त्री अस्वीकार कर देती है। अन्ततः पण्डित जी निर्णय लेते है और उस बच्चे को ठाकुर साहब के पुत्र से बचा कर घर लर आते है।
फिल्म मे पण्डित जी के चरित्र को विशेषकर उभारा गया है। अनेक स्थानों पर सामाजिक विषयों पर उनके द्वारा लिये गये निर्णय अत्यंत तर्क सम्मत हैं। हिन्दुत्व की अत्यंत मार्मिक व्याख्या इस फिल्म मे की गयी है। हिन्दुत्व के वसुधैव कुटुम्बकम् के सिद्धांत का प्रतिपादन यह फिल्म विशेष रूप से करती है। पंकज कपूर का अभिनय अत्यंत सराहनीय है। कुछ स्थानो पर संस्कृत का प्रयोग किया है जिसे समझना सामान्य जनता के लिये कष्टसाध्य है परन्तु वह कथा के क्रम को कहीं भी तोड़ता नही् है। फिल्म अच्छी है और कम से कम एक बार अवश्य देखने योग्य है।
अंततः यही कहूँगा
संगच्छध्वम् संवद्धवम् संवोमनाँसि जानताम् ।
देवाभागम् यथापूर्वे सञ्जानानम् उपासते ।।
सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं कर्वावहे ।
तेजस्विनावधीतमस्तु । मा विद्विषावहे।
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः

Wednesday, March 28, 2007

प्रस्तावना....

जब मैने अपने मित्र अभिषेक ओझा के कुछ लेख पढ़े मुझे भी लगा जीवन की इस आपाधापी मे कुछ क्षण मुझे भी निकालने चाहिये अपने विचारों को व्यक्त करने के लिये। मेरे अंदर का लेखक जो कि शायद कहीं खो गया था या फिर चेतना शून्य हो चुका था वापस से अंगड़ाइयां लेने लगा। मुझे लगा क्यों न अपने अंदर के इस लेखक मे नये प्राण फूँके जायें। पुनः अपने विचारों को मुखरित किया जाय। मेरे मन के स्वछन्द विचार जो इस जीवन शैली मे निस्तेज होते जा रहे थे उन्हें फिर से स्वतंत्र किया जाय।
कारण जो भी हो मैं अब पुनः लिखूँगा.........